Sunday, 10 June 2018

Shakti and Window Seat released


As my books 'Window Seat' and 'Shakti' was released at Kalinga Literature Festival, Bhubaneswar on 10 June 2016,  mango seeds taken from Iimc Dhenkanal were distributed among the audience. We requested the audience to plant these seeds in coming rainy season, which is just round the corner.
Any seed, like any window indicates possibilities and potential. Sow the seed, take care and it grows into a tree and may realise its full potential. Similarly window shows you the outer world and draws into an engagement with the unknown- which eventually brings out the best in you.
Both have the 'shakti' to transform you and probably the world around.
Many present during the book release ceremony took the seeds. I do not know how many will be planted and how many will grow to its full potential. But I am hopeful that some of them will definitely be planted and grow.

Column | Pathe Prantare

Samaya Taranga, 10.6.18

Friday, 8 June 2018

Journalist Fellowship


Posted as received. 8.6.18

Column | Satrangi Batein

सतरंगी बातें

स्त्री...पुरुष 

मृणाल चटर्जी
अनुवाद- इतिश्री सिंह राठौर


एक पुरुष अक्सर यही सोचता है  कि स्त्री नौकरी नहीं करती , आफिस नहीं जाती, घर में रहती हैं, वह कुछ काम नहीं करती । उसका समय बस सोते-बैठते कटता है । बेचारा पुरुष दिनभर मेहनत कर जो पैसे कमाता है उसमें स्त्री एेश करती है । 
    दूसरे मर्दों की तरह नवघन भी यहीं सोचता था । एकदिन उसने ईश्वर से यह प्रार्थना की कि प्रभु ! मुझे औरत बना दीजिए और मेरी पत्नी को पुरुष । ताकि उसके समझ में आए  कि मुझे कितना काम करना पड़ता है । कितनी मेहनत करनी पड़ती है । सुबह उठ कर आफिस जाने के बाद घर  लौटते-लौटते रात को आठ बज जाते हैं । और उसकी बीबी घर में एेश करती है । 
 भगवान उसदिन अच्छे मुड में थे । तुरंत ही नवघन की पुकार सुन ली । अगले दिन सुबह नवघन रंगवति बन गया है और रंगवति नवघन । जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं रंगवति नवघन की बीबी है । 
    सुबह-सुबह नवघन की आंखें खुली । क्योंकि वह रंगवति बन गया था  इसीलिए रंगवति जो-जो काम करती थी उसे करना पड़ा । सुबह उठकर उसने झाडू लगाया । रंगवति जो नवघन बन गई थी उसे चाय बना कर दिया । आखबार लाकर दिया । उसदिन  कामवाली बाई नहीं आई थी । इसीलिए नवघन को बर्तन भी मांजने पड़े । रंगवति के लिए उसने नाश्ता बनाया । टिफिन बना कर पैक किया । रंगवति आफिस के लिए निकली। उसके बाद नवघन ने बच्चों को नींद से जगाया । बच्चे सुबह उठना नहीं चाहते । उन्हें जबरदस्ती उठाया । उन्हें नहलाया, नाश्ता खिलाया, स्कूल के लिए तैयार किया और नाश्ता खिला कर स्कूल बस में बैठा कर लौटा । 
    उसके बाद खुद नहाकर उसने नाश्ता किया । उसके बाद फ्रीज खोलकर देखा तो सब्जी नहीं थी । बाजार गया सब्जी लाने। सब्जी ला कर लौटा तो याद आया टेलीफोन का बिल भरने की आज आंतिम तिथि है । अगर आज बिल न भरे तो फाइन लगेगा । नवघन फिर से टेलीफोन आफिस गया । वहां बहुत भीड़ थी । कतार में खड़ा होकर बिल भरने में दो घंटे लगे । थकाहारा घर लौटने के बाद खाना बनाना पड़ा । चावल कच्चा बना और दाल जल गया । सब्जी में तो नमक ही डालना भूल गया नवघन । 
      इसीबीच बच्चों का स्कूल से लौटने का समय हो गया । बस से उतर कर चौक पर इंतिजार कर रहे  बच्चों को घर लाने के बाद नवघन ने उनके लिए खाना परोसा । बच्चों ने कच्चा चावल, जली हुई दाल और बिना नमक की सब्जी देखकर नवघन पर चिल्लाया । बड़े बेटे ने तो सब्जी फेंक दी । कहा, एेसे गंदा खाना बनाने पर वह बिलकुल भी नहीं खाएगा । 
    खाना खाने के बाद उसे याद आया कि कपड़ों की इस्त्री नहीं हुई । वह इस्त्री करने लगा । इस्त्री करते करते साड़े चार बज गए । बच्चे खेलने चले गए । वह रात के खाने के लिए सब्जी काटने लगा । कुछ समय बाद छोटी बेटी रोते रोते घर आई । वह गिर गई थी । उसे चोट लगी थी । उसके घांव में मरहम लगाया । डाक्टर को फोन पर  सारी बातें बताई । उसने टिटनेस लगाने वाली बात भी पूछी । डाक्टर ने कहा टिटनेस लगाना अच्छा होगा । छोटी बेटी को लेकर वह फार्मासिस्ट के पास गई । टिटनेस इंजेक्सन लगाया । इसीबीच दूसरे बच्चे लौट आए थे । उन्हें नाश्ता देकर पढ़ाना शुरू किया । बड़े बेटे को गणित नहीं आ रहा था । उसे गणित समझाया । 
    इसीबीच रंगवति आफिस से लौट चुकी थी । उसे नाश्ता दिया । बोला, बेटे को थोड़ा गणित पढ़ा दो । रंगवति ने कहा, आफिस में बहुत काम था , वह थक गया है । वह खुद ही पढ़ा दे । बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते रात के साड़े नौ बज गए । उसके बाद सभी के लिए खाना परोसा । खाने के बाद झूठे बर्तनों को किचन में रखा । विस्तर किया । रंगवति ने उसे योन-क्रिया के लिए बुलाया । उसकी इच्छा न होते हुए भी रंगवति का मन रखने के लिए उसने वह भी किया ।
  अगले दिन सुबह नवघन की नींद खुलते ही उसने भगवान से कहा, हे भगवान मैं बहुत ही गलत सोचता था । दरअसल रंगवति को बहुत काम करना पड़ता  है । मैं फिर कभी एेसा नहीं सोचूंगा । मुझे फिर से पुरुष बना दीजिए । भगवान ने कहा, बेटा ! अभी समझ आया कि स्त्री के घर में रहने पर भी उसे कितना काम करना पड़ता है । तुम यह बात समझ गए, मैं खुश हूं । मैं तुम्हें तुरंत फिर से पुरुष बना देता लेकिन उसके लिए तुम्हें नौ महीना इंतिजार करना पड़ेगा क्योंकि तुम गर्भवति हो । 
 (मृणाल चटर्जी ओडिशा के जानेमाने लेखक और प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं । मृणाल ने अपने स्तम्भ 'जगते थिबा जेते दिन' ( संसार में रहने तक) से ओड़िया व्यंग्य लेखन क्षेत्र को एक मोड़ दिया ।इनकी आनेवाली किताबों में से 'विडोसीट' (स्तंभ) और उपन्यास 'शक्ति' (अंग्रेजी  अनुवाद  काफी चर्चा में है । ) 
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